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May 2301
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Kulgeet

मधुर स्वरों को सजा रही है ,
सरस्वती की ललाम वाणी ,
सुधि जनो के तपश्चरण से ,
हुई प्रकाशित ये ज्ञान धनि ,
जो लालता सिंह की सुनाती,
उदारता की अमर कहानी ।
दयाशंकर की लग रही है ,
पवित्र ज्योतिर्मयी निशानी ।।
जो विंध्य-काशी की रत्नमाला में।
सज रही मध्य - मणि सुहानी ।
तरंग गंगा की उच्छलित हो ,
कथा जिसे चाहती सुनाती ।।
सजा रही चुंदरी रंग धानी
हरे -भरे खेतो की रवानी ।
प्रपात की तन्त्रियाँ मनोहर ,
सूना रही गीतिका पुरानी।।
समाज विज्ञान से सुशोभित ,
सुभाषिणी काव्यकला त्रिवेणी ।
नये सुरो से बने सजीली ,
नव -प्रसूनो की फूलदानी ।।
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